कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ त्यौहार का उत्तर भारत में बेहद महत्व

मसौली बाराबंकी। कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ त्यौहार का उत्तर भारत में बेहद महत्व है। रोशनी पर्व दीपावली के खत्म होते ही छठ पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती है जो सूर्य को समर्पित छठ पूजा बेहद स्वच्छता,नियम एव विधि विधान के साथ मनाया जाता है। जिसमे पुरुष एव स्त्री दोनों समान रूप से पूजा करते है।
उत्तर भारत में मनाये जाने वाले इस पर्व को क्षेत्र की ग्राम पंचायत धरौली के मजरे नईबस्ती एव ग्राम पंचायत रहरामऊ के मजरे बसन्तनगर में बड़े ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। दोनों गाँवो के निवासी पूर्व में बिहार के निकटवर्ती जिलो के रहने वाले हैं जिनमे छठ पर्व को लेकर बड़ी उत्सकता रहती है। नईबस्ती गांव के किनारे स्थित ड्रेन एव बसन्तनगर के किनारे स्थित गाड़ी नदी में छठ पूजा के दिन भारी भीड़ जमा होती है। लक्ष्मी पूजन के बाद से ही कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाय खाय का नियम होता है जिसका बड़े ही कड़ाई से पालन किया जाता हैं। व्रत रखने वाले पुरी शुद्धता के साथ बनाये हुए आहार का सेवन करते है शुक्ल पंचमी के दिन खरना पूजाविधि का पालन किया जाता है। सांयकाल के समय घाट पर पूरी शुद्धता से तैयार की गयी गुड़ दूध की खीर और पूड़ी एव फल का भोग छठ माता को लगाया जाता हैं तथा डूबते हुए सूरज को पहला अर्ध्य दिया जाता हैं इसके बाद इस प्रसाद को घर के सदस्यों में बांटा जाता है तथा रात भर घाट पर छठ मइया के गीत गाये जाते है। सप्तमी को सूर्योदय से पहले ब्रह्ममुहर्त में भगवान सूर्य के समक्ष घाट के तट पर अर्ध्य दिया जाता है। यहाँ पर सभी व्रती पुरुष-महिला पकवान, नारियल, और फलदान को लेकर घाट पर एकत्र होते है और उगते हुए सूरज की पूजा करते है। जिसको पारण कहा जाता हैं।
पर्व पर नए कपड़े पहन कर ही पूजा करने का रिवाज है खास बात यह है कि इस व्रत में व्रती महिलाएं डूबते सूर्य को अर्ध्य देकर छठ माता और भगवान सूर्य से पुत्रो की लम्बी आयु की कामना करते है। जिन महिलाओं के बच्चे नही होते है वो महिलाएं भी छठ मइया का व्रत रखती है जिससे उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। मान्यता यह भी है कि इस पर्व में लोग पूजा की सामग्रियों से भरी डलिया अपने सिर पर ही रखकर लाते है। आस्था के अनुसार सिर पर रखकर डलिया लाने वाले व्यक्ति की छठमैया हर मनोकामना पूरी करते है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि सूरज देव की शक्तियों का मुख्य आधर उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की भी आराधना की जाती है। सुबह के अर्ध्य में सूर्य की पहली किरण यानी ऊषा और शाम के अर्ध्य में सूर्य की अंतिम किरण यानी प्रत्यूषा को अर्ध्य देकर दोनों से प्रार्थना की जाती है। माता उनकी सन्तानो की रक्षा और सबका कल्याण करती है।
( सोमवार की शाम को पहला अर्ध्य व मंगलवार की सुबह उगते हुए सुरज को दिया जायेगा अर्ध्य )

मंगलवार को डूबते हुए सुरज को छठ पूजा का पहला अर्ध्य पानी में खड़े होकर सूर्य देव को दिया जायेगा जिसमे बड़ी संख्या मे छठ व्रती अपने पूरे परिवार एवं गाजे-बाजे के साथ छठ घाट पर जाकर शाम को पूरे विधि-विधान से छठ व्रतियों ने डूबते सूर्य एवं छठ माता की आराधना करेंगी
जिसमे छठी व्रतियों ने गेहूं, घी व शक्कर का ठेकुआ, चावल, घी और शक्कर का लड्डू प्रसाद के लिए बना कर बांस के बने सूप डाला, दौरा, टोकरी में प्रसाद को रखकर घाट पहुंचेगी जहा रात्रि भर महिलाए घाट पर रहेंगी तथा मंगलवार को तड़के उगते सूर्य को अ‌र्घ्य दिया जाएगा। उगते हुए सूर्य को अ‌र्घ्य देने के लिए छठ व्रती सूर्य उदय से पहले ही घाट पहुंचने लगेंगे। उगते सूर्य को अ‌र्घ्य देने के बाद 36 घंटे का कठिन व्रत का पारण होगा।

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