बाराबंकी: रेप केस में देर से गिरफ्तारी, महिला सुरक्षा के दावों पर सवाल

बाराबंकी: रेप केस में देर से गिरफ्तारी, महिला सुरक्षा के दावों पर सवाल


जनपद बाराबंकी के मसौली थाना क्षेत्र से सामने आए एक रेप के मामले ने महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के सरकारी दावों की हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला सिर्फ एक गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिस्टम की देरी, संवेदनहीनता और दबाव में काम करने की प्रवृत्ति को भी उजागर करता है।
मामला 3 मार्च 2025 का है, जब एक युवक ने दूसरे धर्म की युवती को शादी का झांसा देकर अपने साथ रखा। आरोप है कि युवक ने लगभग एक माह तक युवती के साथ बिना विवाह के रहकर उसका शारीरिक शोषण किया। बाद में मारपीट कर जान से मारने की धमकी देकर उसे भगा दिया।
पीड़िता का आरोप है कि इससे पहले आरोपी के परिजनों ने मुकदमा संख्या 78/25 में युवती को गुमराह कर बयान बदलवा दिया, जिससे मामला दब गया। इसके बाद 20 मई 2025 को समाजवादी पार्टी के हस्तक्षेप के बाद रेप का मुकदमा दर्ज हुआ। कोर्ट में बयान के बाद विवेचना शुरू हुई, लेकिन हर बार पुलिस की दबिश से पहले आरोपी फरार हो जाता था।
इस दौरान पीड़िता को लगातार धमकियाँ मिलती रहीं। उसने 2 जून, 6 जून और 18 जून 2025 को स्वयं पुलिस कप्तान से मिलकर न्याय की गुहार लगाई। कप्तान के आदेश के बाद पुलिस ने कई बार दबिश दी, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।
न्याय की आस में भटकते-भटकते पीड़िता का पिता सामाजिक अपमान, मानसिक दबाव और तनाव नहीं झेल पाया और उसकी मृत्यु हो गई, जिससे यह मामला और भी संवेदनशील हो गया। यह घटना इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि आरोपी एक संपन्न परिवार से है, जबकि पीड़िता गरीब परिवार से ताल्लुक रखती है और दोनों के धर्म अलग-अलग हैं।
आखिरकार लगभग 10–12 महीनों बाद, 1 फरवरी 2026 को मसौली थाना पुलिस ने मुख्य आरोपी ऋतिक पटेल उर्फ बिट्टू (पुत्र सुनील, निवासी ग्राम सादामऊ) को गिरफ्तार किया। साथ ही सहयोगी के रूप में मनीष यादव (पुत्र राकेश यादव, निवासी ग्राम बड़गांव नाली, थाना मसौली) का नाम भी सामने आया।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे जमीनी स्तर पर इतने कमजोर क्यों साबित होते हैं। अगर समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद पीड़िता के परिवार को यह दर्द, अपमान और टूटन न झेलनी पड़ती।

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